भारत में राजनेता गरीबी मिटाएंगे या फिर गरीबों को

भारत एक भारत एक विकासशील देश है जहां पर गरीबी को एक अभिशाप माना जाता है, ऐसा नहीं है कि भारत एक निर्धन देश है  भारत के अंदर आर्थिक असमानता इस तरह बढ़ती जा रही है कि गरीब और गरीब होते जा रहे हैं और अमीर और भी ज्यादा अमीर होते जा रहे हैं आज समाज में इस खाई को पाटने का समय आ गया है सरकारी आती रहेंगी जाती रहेंगी वही वादे रहेंगे वहीं इरादे रहेंगे पर क्या सबसे गरीबी मिट जाएगी|

गरीबी के आंकड़े कुछ अलग ही रूप भारत का प्रस्तुत करते हैं जिसमें भारत की  60 % जनसंख्या को 2 जून की रोटी भी सही तरीके से नहीं मिल पाती  सरकारे बड़े बड़े वादे करके चली जाती है राइट ऑफ फूड एक ऐसा विषय है जिस पर भारत में बड़े पैमाने पर बहस चल रही है और इसको लागू भी कर दिया गया है, पर क्या हर एक इंसान को खाना मुहैया हो पा रहा है जिसको मुहैया हो पा रहा है वह भी इतना कम  कि लोगों  पेट भी ठीक से ना भर सके |

भारत को आजाद हुए लगभग 70 साल हो गए हैं फिर भी भारत में गरीबी का अनुमोलन  कोई भी सरकार नहीं कर पाई जिस तरह से सरकार गरीबों के विषय पर काम कर रही हैं उसे देखकर तो यही लगता है कि गरीबी नहीं मिटने वाली हां पर गरीब जरूर मिट जाएंगे|

गरीबों के लिए सरकार के पास कोई रोड मैप नहीं है कोई भी सरकार खुलकर यह नहीं बता पाती की गरीबों के लिए वह क्या कर रही है और किस प्रकार से गरीबों की स्थिति सुधारने के लिए काम करेगी बस खोखले वादे चुनाव आने पर झूठे झूठे वादे चुनाव जीत जाने के बाद सब कुछ भूल जाना और सत्ता के नशे में खो जाना यही आजकल के राजनेताओं का  पेशा  बन चुका है, इसी को लोकतांत्रिक तानाशाही कहते हैं कहने को तो भारत में लोकतंत्र है पर जब लोग ही नहीं रहेंगे तो तंत्र किस काम का|

 

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